मानसून की तेज़ बारिश, चक्रवात या भूकंप के बाद सबसे पहले जो चीज़ जाती है, वह है बिजली। और बिजली जाते ही घर का एक बहुत ज़रूरी काम अचानक मुश्किल हो जाता है — खाना पकाना। इंडक्शन चूल्हा बंद, माइक्रोवेव बंद, मिक्सर बंद, फ्रिज बंद। ऐसे में लोग जल्दबाज़ी में जो विकल्प चुनते हैं — कमरे के अंदर अंगीठी, कोयला, या मोमबत्ती के पास गैस — वही असली ख़तरा बन जाते हैं।
मैं पहले अग्निशमन सेवा में काम कर चुका हूँ और आपदा प्रभावित इलाक़ों में तैनात रहा हूँ। वहाँ जो बात बार-बार दिखी, वह यह है कि आपदा के बाद होने वाले कई हादसे आपदा से नहीं, बल्कि आपदा के बाद की “अस्थायी व्यवस्था” से होते हैं — बंद कमरे में जलती अंगीठी, टूटी गैस पाइप, या अंधेरे में खुला छोड़ा गया चूल्हा। यह लेख इसी अंतर को साफ़ करने के लिए है: बिजली न होने पर खाना कैसे पकाएँ, ताकि पेट भी भरे और घर भी सुरक्षित रहे।
- 1. सबसे पहले: पकाने से पहले तीन चीज़ें जाँचें
- 2. सबसे बड़ा ख़तरा: कार्बन मोनोऑक्साइड
- 3. बिजली के बिना पकाने के सुरक्षित विकल्प
- 4. आग से बचाव: पकाते समय के पाँच नियम
- 5. फ्रिज बंद है: खाना कब सुरक्षित है और कब नहीं
- 6. कम पानी और कम ईंधन में पकाने के तरीक़े
- 7. पहले से तैयारी: “पकाने वाला” आपात बॉक्स
- निर्णय के बिंदु: कब पकाएँ, कब रुकें, कब मदद बुलाएँ
- आज ही करने वाले काम (कुल 30 मिनट)
- सारांश
- स्रोत और आधिकारिक जानकारी
1. सबसे पहले: पकाने से पहले तीन चीज़ें जाँचें
बिजली जाने के बाद तुरंत चूल्हा जलाना सबसे आम गलती है। खासकर भूकंप, बाढ़ या तेज़ तूफ़ान के बाद। पहले ये तीन जाँच करें:
- गैस रिसाव की जाँच — नाक से सूँघें। LPG में जानबूझकर तेज़ गंध मिलाई जाती है ताकि रिसाव पकड़ में आ सके। अगर हल्की भी गंध आए, तो माचिस, लाइटर, स्विच या मोबाइल की टॉर्च तक न जलाएँ। पहले सिलेंडर का रेगुलेटर बंद करें, खिड़कियाँ-दरवाज़े खोलें, और बाहर निकलकर गैस एजेंसी या आपातकालीन सेवा को बताएँ।
- पाइप और रेगुलेटर की हालत — भूकंप या पानी भरने के बाद रबर पाइप खिंच सकता है या सिलेंडर अपनी जगह से हिल सकता है। पाइप में दरार, कट या सूजन दिखे तो उसका इस्तेमाल न करें।
- पानी और मलबा — अगर घर में पानी घुसा है, तो गीले फ़र्श पर चूल्हा रखना और गीले हाथों से बिजली के उपकरण छूना दोनों ख़तरनाक हैं। पहले जगह सुखाएँ, फिर पकाएँ।
मैदान का अनुभव: गैस की गंध आने पर लोग सबसे पहले “देखने के लिए” रोशनी जलाते हैं — यही सबसे ख़तरनाक कदम है। नियम सीधा है: गंध आए तो पहले वाल्व बंद, फिर हवा, फिर बाहर।
2. सबसे बड़ा ख़तरा: कार्बन मोनोऑक्साइड
बिजली कटौती में सबसे जानलेवा गलती है बंद कमरे में कोयला, अंगीठी, चारकोल या जेनरेटर चलाना। कोयला जलने पर कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) बनती है — एक ऐसी गैस जिसका न रंग होता है, न गंध, न स्वाद। इसीलिए यह ख़तरनाक है: शरीर को चेतावनी मिलती ही नहीं।
CO विषाक्तता के शुरुआती लक्षण अक्सर आम थकान जैसे लगते हैं, जिससे लोग इन्हें नज़रअंदाज़ कर देते हैं:
- सिरदर्द, चक्कर, जी मिचलाना
- अजीब-सी कमज़ोरी और नींद आना
- सोचने-समझने में धीमापन, उलझन
- घर के कई लोगों को एक साथ एक जैसी शिकायत होना — यह सबसे मज़बूत संकेत है
तुरंत करने वाला काम: ऐसे लक्षण दिखते ही सबको बाहर खुली हवा में ले जाएँ, जलती हुई चीज़ बुझाएँ, और मदद बुलाएँ। कोई बेहोश हो या उलझन में हो तो एम्बुलेंस के लिए 108 या राष्ट्रीय आपात नंबर 112 पर कॉल करें। “थोड़ी देर लेट जाओ, ठीक हो जाएगा” — यह सोच इस मामले में सबसे ख़तरनाक है।
पक्का नियम: कोयला, अंगीठी, चारकोल ग्रिल और जेनरेटर — ये चारों कभी भी घर के अंदर, बंद बरामदे में, गैरेज में या सीढ़ी वाली जगह पर न चलाएँ, चाहे खिड़की खुली ही क्यों न हो। जेनरेटर हमेशा घर से दूर खुली जगह में रखें, जहाँ धुआँ खिड़की या रोशनदान से वापस अंदर न आए।
3. बिजली के बिना पकाने के सुरक्षित विकल्प
भारत के अधिकतर घरों में कम से कम एक विकल्प पहले से मौजूद होता है। ज़रूरत सिर्फ़ यह जानने की है कि किसे कहाँ इस्तेमाल करना है।
LPG गैस चूल्हा (सबसे व्यावहारिक)
बिजली कटौती में यह पूरी तरह काम करता है, बशर्ते रिसाव न हो। ध्यान रखें: ऑटो-इग्निशन वाले चूल्हे कुछ मॉडलों में बिजली पर निर्भर होते हैं — इसलिए घर में माचिस या गैस लाइटर हमेशा रखें। पकाते समय रसोई की खिड़की खुली रखें और चूल्हे को कभी बिना निगरानी न छोड़ें।
पोर्टेबल गैस स्टोव / कैम्पिंग स्टोव
छोटे बुटेन कैनिस्टर वाले स्टोव आपात स्थिति में बहुत उपयोगी हैं। सावधानियाँ:
- हमेशा हवादार जगह पर इस्तेमाल करें — खुली बालकनी, आँगन या खिड़की के पास
- कैनिस्टर को धूप, चूल्हे की गर्मी या गर्म दीवार से दूर रखें
- स्टोव से बड़ा बर्तन (जैसे चौड़ा तवा या बड़ा प्रेशर कुकर) न रखें — गर्मी वापस कैनिस्टर पर पड़ती है, जो ख़तरनाक है
- एक स्टोव पर दो बर्तन या दो स्टोव सटाकर कभी न रखें
मिट्टी का तेल / स्टोव और पारंपरिक चूल्हा
अगर इस्तेमाल करना ही पड़े, तो सिर्फ़ खुले आँगन या छत पर, और आसपास कपड़े, प्लास्टिक या सूखी घास न हो। बारिश में छत पर पकाते समय फिसलन और तेज़ हवा का ध्यान रखें।
बिना आग वाले विकल्प
कई बार सबसे सुरक्षित तरीक़ा यही है कि पकाया ही न जाए:
- सत्तू, चिवड़ा/पोहा (सिर्फ़ पानी में भिगोकर), भुना चना, मूँगफली
- बिस्कुट, रस्क, ब्रेड, खाखरा, थेपला
- केला और अन्य फल, गुड़, खजूर
- UHT दूध के टेट्रा पैक, डिब्बाबंद दाल-सब्ज़ी, रेडी-टू-ईट पैकेट
ये सब गर्मी-नमी में भी टिकते हैं और आपात स्थिति के पहले दिन के लिए काफ़ी हैं। भंडारण को व्यवस्थित रखने का तरीक़ा यहाँ पढ़ें: पानी और भोजन का सुरक्षित भंडारण
4. आग से बचाव: पकाते समय के पाँच नियम
आपात स्थिति में रसोई अस्थायी हो जाती है — फ़र्श पर स्टोव, मोमबत्ती की रोशनी, आसपास बिखरा सामान। यही मिश्रण आग का कारण बनता है।
- स्टोव को समतल, सख़्त और गैर-ज्वलनशील सतह पर रखें — गद्दे, चटाई, अख़बार या प्लास्टिक के ऊपर कभी नहीं
- रोशनी के लिए मोमबत्ती नहीं, टॉर्च या LED लालटेन — गैस रिसाव और खुली लौ का मेल सबसे बड़ी दुर्घटनाओं का कारण है
- ढीली चुन्नी, दुपट्टा और साड़ी का पल्लू बाँधकर रखें — भारत में रसोई में जलने की बहुत सी घटनाएँ इसी वजह से होती हैं
- बच्चों और पालतू जानवरों के लिए “एक मीटर की सीमा” तय करें और उसे साफ़ शब्दों में बता दें
- बुझाने की व्यवस्था पास रखें — तेल में आग लगे तो पानी कभी न डालें; गैस बंद करें और बर्तन को ढक्कन या गीले (टपकते नहीं) मोटे कपड़े से ढक दें। आग बढ़ रही हो तो बुझाने की कोशिश छोड़कर सबको बाहर निकालें और 101 या 112 पर कॉल करें
5. फ्रिज बंद है: खाना कब सुरक्षित है और कब नहीं
मानसून की गर्मी और नमी में खाना बहुत तेज़ी से ख़राब होता है, और आपदा के बाद पेट की बीमारी सबसे आम समस्याओं में से एक है — खासकर तब जब साफ़ पानी और शौचालय की सुविधा पहले ही सीमित हो।
व्यावहारिक नियम:
- फ्रिज का दरवाज़ा बार-बार न खोलें — बंद रखने पर ठंडक कई घंटों तक टिकती है। हर बार खोलने पर वह जल्दी ख़त्म होती है
- पहले क्या खाएँ, इसका क्रम तय करें: पहले फ्रिज का पका खाना और दूध, फिर डीप फ्रीज़र का सामान, और सबसे आख़िर में सूखा राशन व डिब्बाबंद खाना
- पका हुआ खाना कमरे के तापमान पर लंबे समय तक न छोड़ें — गर्म-आर्द्र मौसम में यह जोखिम तेज़ी से बढ़ता है। जितना उसी वक़्त खाया जा सके, उतना ही पकाएँ
- संदेह हो तो फेंक दें — गंध, चिपचिपाहट, रंग बदलना या झाग दिखे तो चखकर जाँचने की कोशिश न करें
- दोबारा गरम करना हर चीज़ का हल नहीं है — कुछ बैक्टीरिया के विषाक्त तत्व गरम करने से भी ख़त्म नहीं होते
पानी का ध्यान: बाढ़ या पाइपलाइन टूटने के बाद नल के पानी को सीधे सुरक्षित न मानें। खाना पकाने और पीने के लिए उबला हुआ (तेज़ उबाल आने के बाद कुछ मिनट तक), या क्लोरीन टैबलेट से शुद्ध किया पानी इस्तेमाल करें। स्थानीय प्रशासन की सलाह हो तो उसे प्राथमिकता दें।
6. कम पानी और कम ईंधन में पकाने के तरीक़े
आपात स्थिति में पानी और गैस दोनों सीमित होते हैं। ये तरीक़े दोनों बचाते हैं:
- प्रेशर कुकर का इस्तेमाल करें — दाल-चावल कम समय और कम गैस में बनते हैं। यह भारतीय रसोई का सबसे बड़ा आपात-लाभ है
- “एक बर्तन” भोजन बनाएँ — खिचड़ी, दलिया, वेज पुलाव: एक ही बर्तन में पूरा पोषण और धोने के लिए कम बर्तन
- बर्तन पर ढक्कन रखें — पानी कम उड़ता है और ईंधन कम लगता है
- बर्तन को प्लास्टिक शीट या साफ़ पॉलीथीन से ढककर परोसें — बर्तन कम गंदे होंगे, धोने का पानी बचेगा
- अनाज पहले से भिगोएँ — चावल, दाल और साबुत अनाज भिगोने से पकने का समय काफ़ी घट जाता है
- आग बंद करने के बाद बर्तन को कपड़े/तौलिये में लपेटें — बची हुई गर्मी से पकना जारी रहता है, गैस बचती है
7. पहले से तैयारी: “पकाने वाला” आपात बॉक्स
यह पूरा सामान एक साथ ख़रीदने की ज़रूरत नहीं। एक डिब्बे में इतना रख देना ही काफ़ी है:
- माचिस और गैस लाइटर — नमी से बचाने के लिए ज़िप वाली थैली में
- पोर्टेबल गैस स्टोव और 2–4 अतिरिक्त कैनिस्टर — ठंडी, छायादार जगह पर
- LED टॉर्च और लालटेन + अतिरिक्त बैटरी — मोमबत्ती का विकल्प
- एक प्रेशर कुकर और एक ढक्कन वाला पतीला
- बिना पकाए खाने लायक भोजन 3 दिन का — सत्तू, पोहा, बिस्कुट, भुना चना, गुड़, ड्राई फ्रूट
- पीने का पानी — योजना बनाते समय लगभग 3 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन (पीने + पकाने के लिए) का हिसाब रखें, और साफ़-सफ़ाई का पानी अलग
- डिस्पोज़ेबल प्लेट, गिलास और एल्युमिनियम फॉयल — बर्तन धोने का पानी बचाने के लिए
- वॉटर प्यूरिफ़िकेशन टैबलेट — बाढ़ के बाद बहुत काम आती हैं
- कैन ओपनर और चाकू — डिब्बाबंद खाना बिना ओपनर के बेकार है
- छोटा फ़र्स्ट-एड बॉक्स जिसमें जलने के लिए साफ़ पट्टी हो
बिजली कटौती के दौरान जानकारी पाने की व्यवस्था भी उतनी ही ज़रूरी है — मोबाइल नेटवर्क अक्सर सबसे पहले जवाब दे देता है। इस पर विस्तार से पढ़ें: आपातकालीन रेडियो और बैटरी बैकअप की गाइड। और गर्मी में बिजली जाने पर शरीर को कैसे बचाएँ, इसके लिए देखें: बिजली कटौती में हीटस्ट्रोक से बचाव
निर्णय के बिंदु: कब पकाएँ, कब रुकें, कब मदद बुलाएँ
बिल्कुल न पकाएँ, अगर:
- गैस की गंध आ रही हो — पहले वाल्व बंद करें, हवा आने दें, बाहर निकलें
- घर में पानी भरा हो और फ़र्श गीला हो
- भूकंप के बाद अभी तक गैस पाइप और सिलेंडर की जाँच न हुई हो
- घर में इतनी हवा-आवाजाही न हो कि धुआँ बाहर निकल सके
तुरंत बाहर निकलें और मदद बुलाएँ, अगर:
- घर के एक से ज़्यादा लोगों को एक साथ सिरदर्द, चक्कर या जी मिचलाना हो — CO का संदेह मानें, कारण बाद में खोजें
- कोई उलझन में हो, ठीक से जवाब न दे रहा हो, या बेहोश हो → 108 / 112
- आग बर्तन से बाहर फैल गई हो → बुझाने में समय न गँवाएँ, सबको निकालें और 101 / 112
पकाना सुरक्षित है, अगर: रिसाव की जाँच हो चुकी है, स्टोव समतल गैर-ज्वलनशील सतह पर है, खिड़की खुली है, कोई वयस्क लगातार निगरानी में है, और रोशनी टॉर्च से आ रही है — मोमबत्ती से नहीं।
आज ही करने वाले काम (कुल 30 मिनट)
- 5 मिनट: गैस पाइप और रेगुलेटर देखें — दरार या पुरानापन दिखे तो बदलवाने का दिन तय करें
- 5 मिनट: जाँचें कि आपका चूल्हा बिजली के बिना जलता है या नहीं; माचिस/लाइटर रसोई में एक तय जगह पर रखें
- 5 मिनट: घर में यह नियम तय करें और सबको बताएँ: “कोयला और जेनरेटर कभी घर के अंदर नहीं”
- 5 मिनट: बिना पकाए खाने लायक 3 दिन का सामान अलग डिब्बे में रखें और उस पर तारीख़ लिखें
- 5 मिनट: टॉर्च की बैटरी जाँचें; मोमबत्ती पर निर्भरता कम करें
- 5 मिनट: 112 (आपात), 108 (एम्बुलेंस), 101 (अग्निशमन) और गैस एजेंसी का नंबर काग़ज़ पर लिखकर रसोई में चिपकाएँ — मोबाइल की बैटरी ख़त्म होने पर यही काम आएगा
सारांश
बिजली कटौती में खाना पकाना असंभव नहीं है — बस तरीक़ा बदलना पड़ता है। तीन बातें याद रखें:
पहली — पकाने से पहले गैस रिसाव की जाँच करें, और गंध आने पर रोशनी जलाने की गलती कभी न करें। दूसरी — कोयला, अंगीठी, चारकोल और जेनरेटर घर के अंदर कभी नहीं; कार्बन मोनोऑक्साइड बिना चेतावनी के आती है। तीसरी — पहले दिन के लिए बिना पकाए खाया जा सकने वाला भोजन सबसे सुरक्षित विकल्प है, इसलिए वह हमेशा घर में रहना चाहिए।
आपदा के बाद का सबसे बड़ा जोखिम अक्सर आपदा नहीं होता, बल्कि जल्दबाज़ी में लिया गया अस्थायी फ़ैसला होता है। ये फ़ैसले पहले से तय कर लेना ही असली तैयारी है — क्योंकि अंधेरे में, थकान में और चिंता में सोचने की क्षमता सबसे कम होती है।
स्रोत और आधिकारिक जानकारी
- राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) — आपदा तैयारी दिशानिर्देश (ndma.gov.in)
- भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) — मौसम चेतावनी और पूर्वानुमान (mausam.imd.gov.in)
- राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) — बचाव व सुरक्षा जानकारी (ndrf.gov.in)
- भारतीय रेड क्रॉस सोसाइटी — प्राथमिक चिकित्सा मार्गदर्शन (indianredcross.org)
- आपातकालीन नंबर: 112 (एकीकृत आपात), 108 (एम्बुलेंस), 101 (अग्निशमन)
नोट: यह लेख सामान्य तैयारी की जानकारी के लिए है, किसी व्यक्ति विशेष के लिए चिकित्सकीय सलाह नहीं। किसी को CO विषाक्तता, जलने या बीमारी का संदेह हो तो देर किए बिना 108 या 112 पर संपर्क करें और चिकित्सक की सलाह लें।
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